Best Shayari Collection of Gair | Shrutikavyam
ग़ैर द्वारा लिखी गई शायरी।
नहीं रहना वहां जहां खुदा रहते हैं।
नहीं रहना जहां इंसान बुरा रहते हैं।
मुझे तो तुम बस वो जगह बता दो,
जो कहीं के नहीं रहते वो कहां रहते है।
छा जाते हैं जब बादल,
जब आसमां से सब गुम हो जाता है।
सो जाते हैं जब लोग सभी,
जब होश - चैन सबकुछ खो जाता है।
तब प्रेम का गुल कहीं बहारों में खिलता है,
बादल के पीछे छिप चांद सितारों से मिलता है।
तन्हां कर दिया नकली से ख़ज़ाने के लिए।
है मोल नहीं कुछ मेरा ये बताने के लिए ।
घर से निकल, बाहर तो आ, नज़र तो घुमा,
खरीदार खड़े हैं कबसे बोली लगाने के लिए।
डरता नहीं कि ये दिल कहीं तेरा हो जाए।
या बैठूं साथ तुम्हारे शाम सवेरा हो जाए।
मिल लूंगा तुमसे कभी खुलकर के मैं,
दुआ करना कि बस अंधेरा हो जाए।
शुरू में सब अच्छा-अच्छा लगता है।
झूठा से झूठा भी सच्चा लगता है।
अंजाम क्या होगा किसको क्या पता,
इश्क़ में हर इंसान बच्चा लगता है।
जो चेहरे से पढ़ लिया जाए,
उसे लिखने की क्या ज़रुरत?
जो ओझल हो चुका दिल से,
उसे दिखने की क्या ज़रुरत?
ज़रुरत है तो बस इतनी सी,
सलामत रहे अमान मुदाम।
जो शोर मचाए ख़ामोशी तो,
उसे चीखने की क्या ज़रुरत?
कभी सूखे ने मारा, तो कभी बारिश ने मारा,
कभी अपनो से प्यार की गुंजाइश ने मारा।
अब बचा नहीं कुछ खास यहां उम्र बिताने को'गैर',
बच गए कहीं जिंदा तो,जीने की ख़्वाहिश ने मारा।
मैं जख्मों से भर चुका हूं,
अब ना सताए कोई ।
तड़पता हूं उदास चेहरा देख,
उसे समझाए कोई ।
मेरे बिना उसे खुशी नहीं,
मेरे साथ उसे चैन नहीं ।
आखिर करूं तो करूं क्या?
मुझे बताए कोई ।
रुक सी गई है जिंदगी यहां,
अब शहर जाऊ क्या ?
चलते-चलते बहुत थक गया,
अब ठहर जाऊ क्या ?
देखा मुहब्बत फरेब मैने,
सबकुछ इस जहान में ।
जी भर के खुद को जी लिया,
अब मर जाऊ क्या ?
हर दिन हर रात मेरी,
बस तेरे प्यार में पले।
तुम मिलते रहना अक्सर,
तुम्हारी कमी ना खले।
मैं इंतजार करूंगी रात में,
बैठकर खिड़की पर तुम्हारा।
तुम जुगनू बनकर आना,
किसी को पता ना चले।
दर - दर पे भगवान की मूरत बदल गई,
सब मिलते ही लोगो की जरूरत बदल गई।
बड़ी दिक्कत से याद किए थे सबके चेहरे,
झपकते ही पलक इंसान की सूरत बदल गई।
हर छोटी सी बात को बहुत खूब बना देंगे।
हर फरमान पर एक नई कुतुब बना देंगे।
ज़रा फासला रखकर मिला करिए जनाब,
वरना लोग आपको भी हमारा महबूब बना देंगे।
अभी भी मेरे लबों पर,
बस तेरा ही ज़िक्र है।
गवाने को है बहुत कुछ,
पर एक तेरी ही फ़िक्र है।
मैं कोशिश में हूं कि,
मिटा दूं हर दीवार को।
जबकि पता है हमारे दरमियाँ
होना सिर्फ़ हिज्र है।
बिना कुछ बोले दिल की बात कह लोगे क्या?
हंसते - हंसते सब दर्द उम्रभर सह लोगे क्या?
हो गया हूं तकलीफ़ मैं तो हो जाता हूं जुदा,
बताओ ज़रा मेरे बिना तुम भी रह लोगे क्या?
अब तू सामने भी आए,
कुछ ख़ास नहीं लगता।
तू बात भी करना चाहे,
तो मैं कुछ बता नहीं सकता।
नज़रंदाज़ करता, तेरी हर झलक,
कुछ इस तरह, दिल को परखता।
लगता है कि दिल रेत हो चुका है,
अब वक्त पर सोता, हूं वक्त पर जगता।
सारी उम्र गुज़र गई,
हर ख्वाहिश मर गई।
बिगड़े हुए इंसान की,
बुरी आदत सुधर गई।
कि तमन्ना थी हर बार,
बस तुझे निहारने को।
मुड़ जाती थी निगाहें,
तुम जब भी जिधर गई।
जिंदगी जीते-जीते इतना रवां हो जाऊंगा,
मैं उम्र को हरा, फिरे से जवां हो जाऊंगा।
तुम तलाशते रहना फिज़ाओं में, बहारों में,
मैं मिट्टी में खो जाऊंगा या हवा हो जाऊंगा।
मेरे मरने पर इतना सा काम करना,
ना कोई दुआ ना कोई सलाम करना।
चुपके से जलाना या कर देना दफ़न,
ना कोई तमाशा सरेआम करना।
जो ईमान भूल गया,
वो ईमानदार कैसा है?
जो मुनाफा ना पाया,
वो दुकानदार कैसा है?
जो रहता है मुफ़्त दिल की मकान में,
बताओ जरा वो किरायेदार कैसा है?
आसमान साफ़ है,ना सितारे हैं ना चांदनी,
अंधेरी रात में अकेले हूं मैं और है रागिनी।
खुली छत पर सोए इस सोच में डूबा हूं,
क्या होगी दुनियां में तुमसा कोई मंदाकिनी।
कोई पानी को तरसा है।
कोई डुबाने को बरसा है।।
कहीं रक़ाबत,कहीं उल्फत,
तो कहीं दग़ा पर चर्चा है।
तरसता हूं मैं मर जाने को, यारों!
जीने में यहां बहुत खर्चा है।
हज़ारों फासले हों फिर भी बात हो जाती,
आंख लगते ही उनसे मुलाकात हो जाती।
दिन निकलते ही उनका मैं दीदार करता हूं
दिल भरता नहीं कि तबतक रात हो जाती।
तेरे दिल से अपनी आंखों की पलक जोड़ जाऊंगा।
तेरी खुशी में मैं खुदा से फलक मोड़ लाऊंगा।
तुम इंतजार में रहना मेरी पूरी कहानी के लिए,
मैं मरते हुए जिंदगी की एक झलक छोड़ जाऊंगा।
मेरे मकां पर नहीं आते या रास्ता भटकने लगे हो?
दिलचस्पी नहीं रही या कहीं और बहकने लगे हो?
तुम छोड़ आए हो अपनी खुशबू कहीं और 'ग़ैर',
अब तुम भी किसी और की तरह महकने लगे हो।
उसके आते ही मेरे शहर का तापमान बढ़ गया।
था मैं सीधा-सादा, उसे देखकर बिगड़ गया।
यूं कहने को तो यहां पर अनपढ़ हैं कई हज़ार,
पर देखते ही हर शख़्स उसकी आंखें पढ़ गया।
तेरा हाल जानने को बेताब हूं मैं।
खोया तुझमें तेरा ही बाब हूं मैं।
ख़ामोश कर एक दीदार से मुझे,
तेरे उल्फत से बना सैलाब हूं मैं।
नींद नहीं आ रही, तेरे खयालों में जग रहा।
सब ठीक है पर, तेरे बिन दिल नहीं लग रहा।
हाज़िर है सबकुछ यहां मन बहलाने को,
पर जाने क्यों मैं बस तेरी ओर भग रहा।
'कुछ नहीं' से 'थोड़ा बहुत'
'थोड़ा बहुत' से 'बहुत कुछ'
'बहुत कुछ' से 'सब कुछ'
फिर धीरे-धीरे सब खत्म।
तुम अपने बदन पर,
ये कौन सा इत्र लगा रहे?
जो भर भर कर यूं
रकीब की खुसबू ला रहे।
और तुम कहते हो,
मैं तुम्हें सही नाम से नहीं बुलाता।अ
अगर बेवफ़ा को बेवफ़ा ना कहें
तो क्या कहें?
सुना है कि तू मुस्कुराता बहुत है,
क्या तेरे इश्क की अभी शुरुआत है?
डूबते अक्सर वही जो करीब होते पानी के,
मत भीग 'ग़ैर' शहर की पहली बरसात है।
हिस्से में मेरे उनका दीदार आया है,
आज जंगल में नया शिकार आया है।
इरादा तो किया है बच नकलने का,
दबोचा जाऊ ख्याल सौ बार आया है।
जिनके लिए सारी हदें पार की,
वही हद में रहने की बात कह गएं।
दर दर पर दर्द मिलता ही रहा,
ये कौन सा नया था,इसे भी सह गएं।
दिल के अमीर मुफ़लिसों वाले काम नहीं करते।
करते हैं बहुत कुछ कभी नाम नहीं करते।
असल में मुहब्बत तो वही होती है 'गैर',
जो बिछड़कर किसी को बदनाम नहीं करते।
