बांट दिए मैने वक्त
बांट दिए मैने वक्त सभी लोगों को खैरात में, पल पल को जब तरसा मैं आया ना कोई साथ में। कहने को सब अपने थे अपनापन था हर बात में, दुनियां से जब स...
बांट दिए मैने वक्त सभी लोगों को खैरात में,
पल पल को जब तरसा मैं आया ना कोई साथ में।
कहने को सब अपने थे अपनापन था हर बात में,
दुनियां से जब सहमा मैं ना हाथ था कोई हाथ में।
मिलकर चलते थे लोगों के हर कदम कदम दिन रात में,
थोड़ी खटपट सी हुई नहीं कि बंटता मज़हब जात में।
जबतक हां में हां मिलाते रहा बन गया था हीरा ताज में,
जब सच सच मुंह पर बोल दिया धूल बनकर गिरा हूं लात में।
दे दिया सबकुछ अपना रहते हैं अब वो ठाठ में,
मन ही मन खुश हो जाते हैं हंसते देख बुरे हालात में।
सब कुछ तो मेरा लूट लिए रहते वो शोहरत साख में,
पर कुछ तो अभी बाकी है जो रहते मेरे फ़िराक में।
अब भी जो मैं चहक उंठू हंस दूं यूंही मज़ाक में,
खो जाता सुख चैन सब हो जाता दम उनकी नाक में।
तुम क्या मेरी फिक्र करोगे सोचोगे क्या मुझे याद में,
सबसे पहले तो 'गैर' हूं मैं अपना हूं बहुत बाद में।
मुझे ना कोई तोड़ सकेगा हों टुकड़े चाहे मेरे लाख में,
वो जला दे चाहे मुझे आग में होगी रौनक मेरी राख में।
- ग़ैर