SHRUTIKAVYAM
By- Omkar Singh 'Ghair'
Home Shayari Sher Kavita Kahani Ghazal Quotes Contact

दूर दूर तक

दूर दूर तक कहीं भी ना मंज़िल दिखाई देती है। पर चलते चलते राहें, चलना सीखा ही देती हैं। सिर्फ़ सिसकियों से मुसीबतों का मन कहां भरने वाला, सुक...
दूर दूर तक कहीं भी ना मंज़िल दिखाई देती है।
पर चलते चलते राहें, चलना सीखा ही देती हैं।

सिर्फ़ सिसकियों से मुसीबतों का मन कहां भरने वाला,
सुकून के लिए तड़पती हैं ये नींदें चुरा ही लेती हैं।

घर सुना पड़ा है बंजर सा वीरान हुआ है खंडहर,
कि सांसे भी अब लूं तो धड़कन सुनाई देती है।

टूटकर बिखर जाते हैं मोती से बुने सब ख़्वाब अब,
और आराम से करवट बदल ज़िंदगी अंगड़ाई लेती है।

अकेला ही चलता हूं राह ए हमसफ़र की नाउम्मीदी लिए,
चलती है माशूक़ा चार कदम पांचवे पे हाथ छुड़ा ही लेती है।
- ग़ैर