सोचो जरा
मैने बीच में ही रोकते हुए पूछा
- ये इंग्लिश वन और इंग्लिश टू क्या है?
- अरे, इंग्लिश वन में स्टोरी, पॉम ये सब पढ़ाया जाता और इंग्लिश टू में नाउन, प्रोनाउन, लेटर ये सब पढ़ाया जाता है।
- अच्छा, तो तुम्हें लेटर लिखने आता है?
- हां मुझे आता है, मुझे तो पूरा याद है।
- पूरा याद है! (मैं थोड़ा सा आश्चर्यचकित हुआ और मुस्कुराया)।
- हां, मेरी मैम याद करवाईं हैं।
- लेटर याद थोड़ी न किया जाता, वो तो लिखा जाता है, उसमे अपनी बातें लिखी जाती।
- नहीं नहीं, मेरी मैम याद करने के लिए कही हैं। जो बुक में दिया है उसे ही याद करके एग्जाम में लिखना रहेगा नहीं तो गलत होगा तो मैम नंबर काट लेंगी।
- अच्छा ऐसी बात है! थोड़ा सुनाओ तो क्या याद की हो?
- फ्रॉम पिपराइच, गोरखपुर
07 जून, 2023
टू शिवपुर आजमगढ़
डियर शिवम,
आई रिसेंटली रिसीव्ड योर लेटर। आई एम फाइन, हाउ आर यू एंड योर फैमिली? हेयर आई लिव विथ माय ग्रांडपेरेंट्स, पैरेंट्स एंड वन ब्रदर एंड टू सिस्ट...
- रुको रुको रुको! ये बताओ तुम यहां अपने दादा-दादी के साथ रहती हो?
- नहीं।
- तुम तो अपने मम्मी-पापा और भाई-बहन के साथ रहती लेकिन लेटर में तो कह रही कि तुम अपने दादा-दादी के भी साथ रहती हो। ये तो गलत कह रही न?
- नहीं! गलत नहीं है। बुक में भी यही दिया है देख लीजिए।
- हां तो बुक में जो लेटर लिखा होगा कोई, वो अपने हिसाब से लिखा होगा। तुम्हें तो अपने बारे में बताना चाहिए न?
- नहीं, मैम यही याद करवाईं हैं, बुक में यही दिया है। यही लिखना भी है वरना नंबर नहीं मिलेगा।
- अच्छा ऐसी बात है?
- हां।
फिर मैं थोड़ी इधर उधर की बातें किया और अपने कमरे में चला गया। मैं सोचने लगा, कितना अजीब है, जहां बच्चों को समझाना चाहिए वहां रटाया जा रहा। ऐसा नहीं है कि बच्चे समझ नहीं सकते, बात ऐसी है कि कोशिश भी नहीं की जा रही। जहां पर बच्चों के अंदर सोचने की, समझने की क्षमता विकसित करनी चाहिए वहां पर उनको रटने की मशीन बनाया जा रहा, ऊपर से डर भी भरा जा रहा कि नंबर काट लिया जाएगा वगैरा वगैरा।
क्या ऐसा नहीं किया जा सकता था कि पहले बच्चों को समझाया जाए कि लेटर क्या होता है, उसे कैसे लिखता जाता, क्यूं लिखा जाता। फिर सभी बच्चों से अपने अपने हिसाब से हिंदी या अंग्रेजी में लेटर लिखवाया जाता फिर जो बच्चे हिंदी में लिखे रहते या टूटी फूटी अंग्रेजी में ही तो उसे सुधार करके सही और शुद्ध अंग्रेजी में लिखा दिया जाता। ऐसा बिलकुल किया जा सकता था। हां थोड़ा वक्त लगता लेकिन इससे बच्चों की सोचने समझने और लिखने की क्षमता विकसित होती। स्कूल तो इसीलिए होता है, ना की मशीन बनाने के लिए।
और ऐसा सिर्फ़ एक स्कूल में, एक विषय में या एक बच्चे के साथ नहीं हो रहा। बल्कि हर स्कूल की यही कहानी है चाहे वो सरकारी स्कूल हो या प्राइवेट। हां कुछ बड़े महंगे स्कूलों में ऐसा नहीं है लेकिन जहां तक मुझे पता है भारत के ज्यादातर बच्चे या तो किसी ऐसे प्राइवेट स्कूल में पढ़ते जिसे मिडिल क्लास के लोग अफोर्ड कर सकें या तो वो सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। पहला चुनाव तो प्राइवेट स्कूल ही होता क्यों कि सरकारी स्कूलों की हालत सबको पता है। पर क्या फ़र्क पड़ता कि सरकारी स्कूल है या प्राइवेट, मशीन बनने से बेहतर तो यही है कि थोड़ा कम पढ़ा लिखा जाए।
वैसे इसमें गलती किसकी है, स्कूल की? जिसने ऐसे अध्यापकों को भर रखा है या ऐसे अध्यापकों की जिन्होंने अपना कर्तव्य का पालन नहीं किया या उन अभिभावकों की जिसने बच्चे को मशीन बनने के लिए वहां भेज दिया या सरकार की जो इन सब चीजों के लिए कोई नीति नहीं बना रही? गलती चाहे जिसकी भी हो, लेकिन एक बात तो साफ़ साफ़ कही जा सकती है कि उस बच्चे की कोई गलती नहीं है जिसे मशीन बनाया जा रहा। हां, ये कहा जा सकता है कि गलती किसी एक की नहीं है बाकी सब गुनाहगार है, कोई थोड़ा तो कोई ज्यादा। पर कोई अपनी गलती मानने को तैयार नहीं होगा, यही तो मावन स्वभाव है।
कोई पैसा कमाने के लिए स्कूल खोल रहा तो कोई पैसा कमाने के लिए पढ़ाने लग रहा तो कोई अपने बच्चे को उसी स्कूल में भेज रहा। दुनियां में सबसे जिम्मेदारी भरा जो काम है ( एक बच्चे की परवरिश करना) वो मुख्यतः दो लोगों के कंधे पर है, एक माता-पिता और दूसरे अध्यापक ( काश मैं उन अध्यापकों को गुरु कह पता)। खैर मुझे माता-पिता से उतनी दिक्कत नहीं है, हो सकता है वो अच्छे से परवरिश ना कर पाएं क्यों कि ना ही उन्हों ने मनोविज्ञान पढ़ा रहता ना ही परवरिश करने का कोई कोर्स किया रहता। फिर भी वो अपने जानते भर में कभी कोई कमी नहीं छोड़ते। मां-बाप के फैसलों को परिणाम गलत हो सकता है लेकिन अपने बच्चों के लिए उनकी नियत गलत नहीं रहती। मुझे दिक्कत उन अध्यापकों से है जिन्हें ना ही अपने विषय की जानकारी है, ना ही मनोविज्ञान की। वो बस पैसे कमाने के लिए पढ़ाना शुरू कर देते। ना ही उन्हें पढ़ाने का वैज्ञानिक तरीका मालूम है ना ही उन्हें थोड़ा भी अहसास है कि वो जो कर रहें हैं वो कितना गलत है। वैसे आजकल आसन भी हो गया है, जो कुछ नहीं करता वो पढ़ाना शुरू कर देता। हालांकि किसी को पढ़ाना बड़ी जिम्मेदारी तथा मुश्किल भरा काम है उन्हें नहीं पता। बस पैसा चाहिए भले ही किसी बच्चे का पूरा भविष्य खराब हो जाए।
वैसे देखा जाए तो होता भी तो यही है। कुछ ऐसे बच्चे होते जिन्हें बचपन से ही रटना सीखा दिया जाता, ना ही उन्हें सवाल पूछने दिया जाता, ना ही सोचने दिया जाता। ठीक है, बचपन में तो रट कर काम चल जाता लेकिन जब वो ऊपरी कक्षा में जाते हैं, जहां चीजों को समझना पड़ता है, वहां रटने से काम नहीं चलता, वहां वो कमजोर होने लगते और उन्हें लगता है कि उनकी ही गलती है कि वो पढ़ने में कमजोर हैं। आप ही देख लो, स्कूल में कोई कहानी पढ़ाई जाती फिर पाठ के अंत में कहानी से संबंधित कुछ प्रश्न दिए रहते तो जब अध्यापक ने अच्छे से पाठ पढ़ा दिया है तब तो बच्चे को हर प्रश्न का उत्तर दे देना चाहिए, भले ही वो पाठ में से देखकर, खोजकर बताए। लेकिन नहीं, यहां तो ऐसा होता कि अध्यापक खुद बताते की देखो इस सवाल का जवाब ऐसे लिखना हैं। इससे पहले कि बच्चा सोचे, उसे रोक दिया जाता। अध्यापक हर प्रश्न का उत्तर सोचने से पहले ही उसे लिखवा देते। फिर क्या, बच्चा रट रट कर याद कर लेता। कितना अच्छा होता कि अध्यापक बस पाठ पढ़ा दे, फिर बच्चे अपने मन से सभी प्रश्नों के उत्तर खोजे और अध्यापक जांच करें की सभी बच्चों ने सही सही उत्तर लिखा है या नहीं। वैसे जांच भी कैसे करेगा चालीस मिनट की तो घंटी होती और पचास बच्चे भरे रहते। पर हां, जिस दिन किसी अध्यापक को अहसास होगा कि वो न जाने कितने बच्चों की सोच को मारकर उन्हें मशीन बना दिया है तो उसे दुनियां में खुद से बुरा इंसान कोई नहीं दिखेगा। लेकिन कमाल की बात तो देखें, शायद ही किसी को अहसास होता होगा, मैने कहा न, मानव स्वभाव है।
आप खुद देखें, अपने अतीत को देखें, क्या आप सोचते हैं, क्या आप सवाल करते हैं, या फिर आपके साथ भी ऐसा ही हुआ है, जो चीजें मिलती हैं बस आप मान लेते, ना सोचना है, ना सवाल करना है, बस वही मान लेना है। क्यों की बचपन से तो आपको यही सिखाया गया है। वैसे नहीं, ऐसा नहीं होगा, अब आप बड़े हो गए हैं तो जरूर सोचते होंगे या सोचती होंगी। पर आप सोचेंगे भी तो कितना गहरा, कितना तार्किक सोच पाएंगे, शायद आप सतह पर ही सोच पाएं क्यों कि बचपन में ही सोचने वाली क्षमता को तो दबा दिया गया है। अगर आप चाहें तो अब भी सोचना शुरू कर सकते हैं, सवाल करना शुरू कर सकते हैं, हां थोड़ी मुस्किल होगी लेकिन दिमाग़ की ख़ास बात यह है कि यह हमेशा सीखने के लिए तैयार रहता। अगर बचपन में आपके साथ अन्याय हुआ है तो उससे उभर सकते हैं बस थोड़ी मेहनत करनी होगी। आपको सोचना होगा, सवाल करना होगा चाहे वो कोई भी बात हो चाहे आपके साथ घटने वाली घटना हो, धार्मिक मान्यताएं हो, वैज्ञानिक तर्क हो या कुछ भी हो। आप सोचे, आप अपनी सोच के खिलाफ़ सोचे, एक बार दूसरे नज़रिए को सही मानकर उसके तरीके से सोचे। हां मैं समझ रहा कि अबतक आपने कई सारी सोच विकसित कर ली होगी और उसे खिलाफ़ सोच पाना मुस्किल होगा लेकिन अगर आपको अपने दिमाग़ को विकसित करना है तो ये काम करना पड़ेगा।
वैसे अंत में एक मजे की बात बता रहा, आप लोग अगर यहां तक पढ़े है तो शायद ही आप में से कोई मानने को तैयार हो कि उसके साथ भी ऐसे ही हुआ है, उसे सोचने से रोका गया है। आप में से हर किसी को यही लगेगा कि मैं तो परफेक्ट हूं, मेरे अंदर इस चीज की कमी नहीं है, मैं तो सोचता हूं, जैसा मैंने कहा, मानव स्वभाव। लेकिन याद रखे सोचने की कोई सीमा नहीं होती, जितना गहरा हो सके उतना गहरा सोचे। एक दिमाग़ ही है जो आपका है और वो जिस काम के लिए हैं उसे वो काम करने दें। अगर बचपन में हुए गलतियों को आप अब नहीं सुधरेंगे तो आप भी खुद के साथ अन्याय ही करेंगे। अभी भी वक्त है, अभी से शुरू करें।
- ग़ैर