काँटे
मैं सोचता हूं कैसा लगता होगा उन कांटों को, जो सारी उम्र बिता देते फूलों की हिफ़ाज़त में। और किसी रोज अपनी प्रेमिका को खुश करने को कोई प्रेमी...
मैं सोचता हूं कैसा लगता होगा उन कांटों को,
जो सारी उम्र बिता देते फूलों की हिफ़ाज़त में।
और किसी रोज अपनी प्रेमिका को खुश करने को कोई प्रेमी,
आता है उन फूलों को तोड़ ले जाता है।
और कितना खुश होती होगी वो प्रेमिका अपने प्रेमी से,
जब कहता होगा वो तुम भी इसी फूल जैसी हो।
और फूल कहता होगा मुस्कुराकर धीमे से,
मैं भी किसी का फूल था अब बारी तुम्हारी है।
और मैं सोचता हूं कांटें हमे बहुत कुछ सीखा जाते,
वो टूटते नहीं इतना कुछ होने के बाद भी,
ना ही वो किसी की आस में उम्र गवाते हैं,
वो फिर से नए फूल की हिफ़ाज़त में लग जाते हैं।
- ग़ैर