SHRUTIKAVYAM
By- Omkar Singh 'Ghair'
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ज़मीन

एक उर्वर ज़मीन थी, वहां वसंत था, बरसात थी, पतझड़ था, हरियाली थी। पर वहां कोई शख़्स नहीं था। पत्ते अपने आप गिरते, खाद बन जाते, उन खाद से नया ...
एक उर्वर ज़मीन थी,
वहां वसंत था, बरसात थी,
पतझड़ था, हरियाली थी।
पर वहां कोई शख़्स नहीं था।
पत्ते अपने आप गिरते, खाद बन जाते,
उन खाद से नया पौधा निकलता।
चिड़ियों का बसेरा था,
तरह तरह के जंतु थे।
फ़िर एक दिन वहां एक शख़्स आता है,
उस स्वर्ग को देख चौक जाता है।
इतना खुशी जैसे परमसुख मिल गया हो,
और ज़मीन का अकेलापन भी दूर हो जाता।
जंगल में नए पेड़ लगते हैं,
हर दिन प्यार से सिंचा जाता।
लेकिन जब तेज बारिश होने लगी,
चारों तरफ़ बाढ़ आने लगी,
वो शख़्स मुसीबत में पड़ गया।
उसने कुछ पेड़ काटे,
अपने लिए सुरक्षित मकान बनाएं।
स्वाद के लिए शिकार शुरू किया।
धीरे धीरे जंगल से पेड़ कम होने लगे,
पानी प्रदूषित होने लगा, पंछी मरने लगे।
देखते ही देखते समुद्र सूख गए,
ज़मीन रेगिस्तान हो गई।
अब उस ज़मीन पर एक बूंद भी पानी नहीं,
ना ही कोई हरियाली है।
पर हां,
कहीं कहीं कुछ कांटेदार पौधे नज़र आ जाते।
ज़मीन पर अब सिर्फ़ अंधेरी रातें हैं,
वो ज़मीन मेरी आंखें हैं।
       - ग़ैर